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मुस्लिम समाज:आधी आबादी की शिक्षा का वादा अभी अधूरा

By हुसैन ताबिश

सरकारी स्कूल की पांचवी कक्षा की छात्रा आमना हिंदी में सिर्फ अपना नाम लिख पाती है, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद सड़क, गाड़ी, बाजार, चीनी, जागरण जैसे आसान शब्दों को पढ़ने में वह नाकाम रहती है। उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों की उसे कोई पहचान नहीं है। उसकी संख्यात्मक अभियोग्यता भी शून्य है। आमना की मां शकीला कहती है, ’’मास्टरवा ही ठीक से नहीं पढ़ाता होगा। आमना तो रोज स्कूल जाती थी, बस लाॅकडाउन के बाद से वह स्कूल नहीं गई है।’’ आमना के पिता मुजीब गुजरात में मजदूर है। मां शकीला भी गांव में खेतों में काम करती है। आमना का बड़ा भाई और दो छोटी बहने कभी स्कूल नहीं गए हैं।

पाँचवी कक्षा की छात्रा आमना बहुत ही गरीब परिवार से आती है


समस्तीपुर के बलभद्रपुर गांव में इसी मोहल्ले में आमना के पड़ोस में रहने वाली और उसकी सहपाठी रहनुमा हिंदी में सड़क, गाड़ी, बाजार और चीनी लिख लेती है। वह इंग्लिश में मंडे की स्पेलिंग तो सही करती है, लेकिन जनवरी लिखने में गलती कर देती है। वह उर्दू के छह अल्फाजों में दो सही से लिख लेती है। संख्यात्मक अभियोग्यता उसका भी शून्य है। अपने जिले, राज्य, देश, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बारे में रहनुमा नहीं जानती है। रहनुमा के पिता इंटर पास हैं और गांव में पाॅल्ट्री फार्मिंग का काम करते हैं।  


बेगूसराय के मंसूर चक में रहने वाले हाशिम और उसके भाई जुबैर की बेटी तहरीन और मुसर्रत पिछले साल 10वीं की परीक्षा पास कर अभी ग्यारवी में पढ़ती है। तहरीन और मुसर्रत दोनों मृत्युंजय, अरुण, शमशेर, अलंकृता, इंजीनियर, अतिथि और चीनी जैसे शब्द सही-सही नहीं लिख पाती है। उसे यह भी नहीं मालूम है कि इस वक्त देश का राष्ट्रपति कौन है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वह अच्छे से पहचानती हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश बिहार में है या दिल्ली में इस सवाल में वह उलझ जाती है। वातावरण में नाइट्रोजन और कार्बन के अलावा कौन सा गैस होता है, इस सवाल को सुनते ही दांत निपोर कर दोनों आंगन से उठकर कमरे में भाग जाती है। बीड़ी बनाने का काम करने वाले उनके माता-पिता अपनी बेटियों का बचाव करते हुए कहते हैं, ’’इन दोनों ने सिर्फ हिसाब (गणित) का टयूशन किया है इसलिए दूसरे विषयों में कमजोर है जबकि 32 रुपये प्रति लीटर बिकने वाले दूध का 250 ग्राम का कितना पैसा होगा दोनों में से कोई भी लड़कियां जवाब नहीं दे पाती है।

मंसूरचक की ग्यारहवीं की छात्रा तहरीन और मुसर्रत


मुजफ्फरपुर के रतनपुरा गांव की सबिहा दो साल पहले 12वीं पास कर चुकी है। उसी घर में उसके चाचा की लड़की जैनब ने भी उसके साथ 12वीं पास की थी। सबिहा और जैनब दोनों आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन दोनों के अभिभावकों ने उनकी शादी कर दी। इत्तेफाक से दोनों एक साथ ससुराल आई हुई हैं। उन दोनों में से किसी को नहीं पता है कि अभी बिहार में कौन सा चुनाव हो रहा है। उनका अभी वोटर कार्ड भी नहीं बन पाया है। दोनों लड़कियों के पास स्मार्ट फोन है। वह फेसबुक के बारे में जानती है लेकिन इस प्लेटफाॅर्म पर अभी उनका अकाउंट नहीं है।

ये दोनों लड़कियां अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी की पहली लड़की है जो स्कूल गई हैं। हालांकि इसी घर में सबिहा का बड़ा भाई शकील पाॅलिटेकनिक की पढ़ाई कर पुणे में नौकरी करता रहा है। पुरुषों में भी पढ़ने-लिखने वाला परिवार का वह पहला आदमी है। इन दोनों के पिता कोलकाता में प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। सबिहा और जैनब मेरे कैमरे में अपनी तस्वीरें खींचने से मना कर देती हैं।  
इसी गांव के उच्च जाति के मुसलमानों के घरों की कई लड़कियां दिल्ली, लखनउ, भोपाल, हैदराबाद और कोलकाता में रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही है जबकि पसमांदा समाज की लड़कियां थोड़ी-बहुत जो शिक्षा ले रही हैं, वह भी स्तरहीन है। पढ़ने का साहस करने वाली लड़कियां ज्ञान नहीं बल्कि डिग्रियां ज्यादा बटोर रही हैं। ये हालात पूरे बिहार के हैं। कई लड़कियां पढ़-लिखकर वाकई अच्छा करना चाहती हैं, लेकिन उनकी राह में पारीवारिक, सामाजिक और आर्थिक पस्थितियों के अलावा प्रदेश का बीमार शिक्षातंत्र भी रोड़े अटका देता है। काॅलेजों में शिक्षक नहीं है। समय पर परीक्षाएं नहीं होती है। बिहार में तीन साल का ग्रेजुएशन करने में 5 से 7 साल तक लग जाते हैं।    
सरकारी स्कूल के सेवानिवृत शिक्षक रफीक अहमद कहते हैं, ’’शैक्षणिक रूप से हमारा समाज हाशिए पर है। आज भी उन्हीं घरों के बच्चे और लड़किया पढ़ती हैं जो पहले से पढ़ा-लिखा परिवार है। प्राथमिक, मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय के स्तर पर मीड-डे मील, छात्रवृति, पोशाक, साइकिल और 10वीं-12वीं पास करने पर सरकार की तरफ से मिलने वाली प्रोत्साहन राशि के कारण स्कूलों में नामांकन तो बढ़ गया है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पहले से भी ज्यादा खराब हो गई है। ढ़ेर सारे ऐसे बच्चे होते हैं जो 5वीं कक्षा पास कर जाते हैं और उन्हें अक्षर ज्ञान तक नहीं होता है। ऐसे बच्चों में सभी धर्मों के अर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं। मुसलमानों और खासकर पसमादंा मुस्लिम समुदाय में ये समस्या बहुत ज्यादा है।
देश में इस समय महिला साक्षरता का प्रतिशत 64.6 प्रतिशत है जबकि बिहार में महिला साक्षरता का दर अभी 51.5 प्रतिशत है।  2001 के जनगणना के अनुसार, मुस्लिम समाज के उंची जाति के मुस्लमानों में महिला साक्षरता ग्रामीण इलाकों में 34.1 प्रतिशत जबकि शहरी इलाकों में 47 प्रतिशत है। मध्य श्रेणी की जातियों में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिला साक्षरता का दर क्रमशः 26.2 प्रतिशत और 42.2 प्रतिशत है जबकि निम्न जातियों में यह प्रतिशत क्रमशः 26.2 और 39.4 प्रतिशत है।

सरकारी स्कूल मे पढ़ रही पाँचवी की छात्रा रहनुमा

मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा में कम भागिदारी और सरकारी स्कूलों में गिरते गुणवत्ता के सवाल पर मुस्लिम मोहल्लें के सरकारी स्कूल के एक शिक्षक जुनैद अहमद बताते हैं कि इसके कई कारण हैं। स्कूलों में पठन-पाठन का कोई माहौल ही नहीं है। अभी पढ़ाई से ज्यादा मिड-डे मील महत्वपूर्ण है। शिक्षकों के पास गैर शिक्षकेत्तर कार्यों का इतना अधिक बोझ होता है कि वह अपना पढ़ाई का मूल काम ही नहीं कर पाते हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की बेहद कमी है। जो सक्षम लोग हैं उनके बच्चे तो इन्हीं स्कूलों में पढ़-लिख लेते हैं, जो नहीं पढ़ते हैं उनके साथ कई दिक्कतें हैं। आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों के बच्चों और लड़कियों को स्कूल के अलावा मजदूरी भी करनी होती है। उन्हें घर का काम भी करना होता है। स्कूल से घर जाने के बाद वह पढ़ाई नही ंकर पाती हैं, अगर करती भी हैं तो उसकी निगरानी नहीं की जाती है।
प्राइमरी से उपर और सेकंड्री से नीचे ग्रामीण और शहरी इलाकों में मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता का प्रतिशत क्रमशः 29.1 और 36.1 प्रतिशत है जबकि सामान्य महिलाओं का प्रतिशत ग्रामीण और शहरी क्षेत्र मे ंक्रमशः 23.3 और 34.1 प्रतिशत है। स्नात्क या उससे उपर की पढाई में सामान्य श्रेणी की महिलाओं ग्रामीण और शहरी 3.9 एवं 13.8 प्रतिशत के मुकबाले में मुस्लिम महिलाओें का प्रतिशत ग्रामीण और शहरी इलाकांे का साक्षरता प्रतिशत दर क्रमशः 1.6 और 8.1 प्रतिशत है। स्कूल कभी न जाने वाली और नामांकन करा कर पढ़ाई छोड़ने वाले में भी मुस्लिम समाज की लड़कियों का प्रतिशत सामान्य श्रेणी की महिलाओं से ज्यादा है।
उच्च शिक्षा में भी मुस्लिम और खासकर पसमांदा समाज की लड़कियों की भागिदारी काफी कमजोर है। उन्हें कई स्तरों पर समस्याओं का सामना करना पता है।
पसमांदा मुस्लिम समस्याओं का अध्ययन करने वाले दरभंगा के शिक्षाविद् डाॅ. अयूब राईन कहते है, इसके लिए सरकार की नीतियों के अलावा मुस्लिम समाज का टाॅप नेतृत्व भी जिम्मेदार है। मुस्लमानों का नेता और पढ़ेे-लिखे वर्ग ने कभी इस समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया। एक ही बस्ती में अशराफ मुस्लमानों के घरों की लड़कियां पारंपरिक बीए, बीएससी और एमए, पीएचडी के साथ इंजीनियरिंग, मेडिकल, डेंटल जैसी तकनीकी शिक्षा ग्रहण करती हैं जबकि पसमांदा समाज की लड़कियां ढंग से दसवीं तक पास नहीं कर पाती है। वह कहते हैं, आजादी के 72 सालों बाद भी पूरी बिहार में बक्खो समाज के सिर्फ 12 लोग ग्रेजुएट बने हैं और उनमें लड़कियों की संख्या सिर्फ एक है। हालांकि वह यह भी स्वीकार करते हैं कि पिछले दस सालों में हालात काफ बदले हैं। अशराफ और पसमांदा दोनों वर्ग की मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा में भागिदारी बढ़ रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता रूबीना कहती हैं, मुसलमानों में चाहे वह अशराफ हों या पसमांदा वर्ग दोनों में आज भी अधिकांश लड़कियों को सिर्फ धार्मिक शिक्षा या फिर इतनी ही तालीम दी जाती है कि उसकी शादी हो सके। उसे कोई अच्छा लड़का मिल जाए। गुणवत्तापूर्ण और आला तालीम पर यहां कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। लड़कियां काॅलज में सिर्फ एडमिशन करवाती हैं और एग्जाम देने जाती हैं। बिहार का बदहाल उच्च शिक्षा भी उसके इस कदम में सहयोग करता है।
बिहार अल्पसंख्यक आयोग के 2017 के एक सर्वे से भी यह बात पुष्ट होती है कि ग्रामीण इलाकों के  26.3 और शहरी इलाकों के 12.2 प्रतिशत अभिभावक अपनी लड़कियों को सिर्फ धार्मिक शिक्षा तक महदूद रखना चाहते हैं। वहीं 60.2 प्रतिशत ग्रामीण और 51.8 प्रतिशत शहरी अभिभावक अपनी लड़कियों को सेकंड्री स्तर तक स्कूली शिक्षा दिलाने की हिमायत करते हैं। यहां यह जानना दिलचस्प है कि सिर्फ 13.6 प्रतिशत ग्रामीण और 36.1 प्रतिशत शहरी अभिभावक अपनी बच्चियों को स्नात्क या उससे उपर की शिक्षा दिलाना चाहते हैं।

दरभंगा के केवटी प्रखण्ड की छात्राएं

मुस्लिम समाज में स्त्री शिक्षा के पिछड़ेपन के मुद्दे पर महात्मा गांधी सेंट्रल विश्वविद्यालय में डिवेलपमेंट कम्यूनिकेशन के व्याख्याता डाॅ. साकेत रमण इसके लिए कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं, ’’ इसके मूल में मुस्लिम समाज में प्रचलित पर्दा प्रथा और कम उम्र में लड़कियों की शादी का रिवाज रहा है। आर्थिक पिछड़ापन, बहु विवाह और परिवारों का बड़ा आकार भी इस समस्या का कारण रहा है। बड़े परिवारों में हमेशा शिक्षा से ज्यादा रोजगार को प्राथमिकता दी जाती है। यही वजह है कि मुस्लिम परिवारों में लड़कों के बीच भी सामान्य शिक्षा के बजाए हुनर पर जोर दिया जाता रहा है। डाॅ. साकेत कहते हैं कि इसके लिए हमारी सरकारें भी जिम्मेदार रही हैं। आज भी स्कूल और काॅलेज घर के पास नहीं हैं। लड़कियों को स्कूल-काॅलेजों के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। वह रोज-आने जाने में सहज नहीं है। यहां महिलाओं के सुरक्षा का भी सवाल है। आजादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ज्यादा रचनात्मक कार्य नहीं किए गए है, जिसका खामियाजा अन्य वर्गों के साथ मुस्लिम समाज की लड़कियों को भी उठाना पड़ा है।
हैदराबाद स्थित मौलाना आजाद नेशनल ओपन उर्दू यूनिवर्सिटी से बीएड की पढ़ाई पूरी करने वाली पूर्वी चंपारण की शाजिया परवीण कहती हैं, ’’मेरे लिए घर से हैदराबाद जाकर पढ़ाई करना बिल्कुल आसान नहीं था। इसमें सबसे चुनौतीपूर्ण काम अभिभावकों को इस बात के लिए राजी करना था। घर से दूर लोग जाने देना नहीं चाहते थे लेकिन आज मेरे गांव की तीन लड़कियां वहां से बीएड की पढ़ाई कर रही है।’’ शाजिया जैसी ढेर सारी ऐसी लड़कियां है जो तमाम समस्याओं और बाधाओं को पार करते हुए समाज के अन्य लड़कियों और अभिभावकों के लिए मिसाल बनने और प्रेरणा देने का काम कर रही हैं।

नोटः यह रिपोर्ट सेंटर फाॅर रिसर्च एंड डायलग ट्रस्ट के बिहार चुनाव रिपोर्टिंग फेलोशिप के तहत प्रकाशित की गई है।    

Written by Bihar Coverez

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