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मन के लिए नाटक करता है और पेट के लिए पंचर बनाता है यह एक्टर

बिहार का मोतीहारी शहर कपिलदेव राम को एक अच्छे अभिनेता के रूप में जानता है, वे नुक्कड़, रंगमंच और भोजपुरी फिल्मों में भी अपने अभिनय का जादू बिखेर चुके हैं, मगर रोजी-रोटी के लिए वे आज भी अपनी पंचर की दुकान पर बैठते हैं।

पुष्यमित्र

बिहार के मोतीहारी शहर में रविदास मंदिर के पास एक पंचर की दुकान है, कपिलदेव राम वहीं पर किसी साइकिल, मोटरसाइकिल का पंचर बनाते नजर आ जाते हैं. मगर अक्सर शाम के वक्त जब वहां शहर के रंगकर्मियों की टोली जुटती है और नाटक-नुक्कड़ से जुड़े मसलों पर बात होने लगती है तो वहां का माहौल ही बदल जाता है. आसपास गुजर रहे लोग यह देखकर चकित होने लगते हैं कि यह पंचर बनाने वाला आदमी रंगमंच की चर्चा इतनी गंभीरता से कैसे कर रहा है. दरअसल कपिलदेव राम का पेशा जरूर पंचर बनाना है, मगर शहर में उनकी पहचान एक बेहतरीन अभिनेता और प्रतिबद्ध रंगकर्मी के रूप में है. 1992 से लेकर अब तक वे लगातार अपने अभिनय, पटकथा और निर्देशन से शहर के लोगों का मनोरंजन और उन्हें जागरूक कर रहे हैं. उन्होंने कई भोजपुरी फिल्मों में भी छोटी-बड़ी भूमिकाएं की हैं. मगर रंगमंच से उतरने और कैमरे के सामने से हटने के बाद वे हर रोज इसी पंचर की दुकान पर बैठते हैं. उनका घर पंचर बनाने के पेशे से ही चलता है.

अपने जीवन में रंगमंच की शुरुआत का जिक्र करते हुए कपिलदेव राम कहते हैं कि वे वस्तुतः महादलित समुदाय के व्यक्ति हैं. उनका परिवार किसी अन्य महादलित परिवारों की तरह अभाव में ही जीता रहा था, मगर संयोग यह हुआ कि उन्हें इंटरमीडियेट तक पढ़ने का मौका मिल गया. मोतीहारी शहर के ही एसएमएस कॉलेज में जब वे इंटरमीडियेट की पढ़ाई कर रहे थे, तभी कॉलेज में एक नाटक प्रतियोगिता आयोजित की गयी थी. इस प्रतियोगिता में उन्होंने भी भाग लिया और अभिशप्त नामक एक नाटक खुद लिखकर तैयार किया और इसकी प्रस्तुति दी. इस नाटक को देखने जो जज आये थे, वे इनसे काफी प्रभावित हुए और इनकी सराहना की. तभी से इन्होंने रंगमंच को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया.

गरीबी की वजह से वे इंटरमीडियेट के आगे पढ़ नहीं पाये और पंचर की दुकान चलाने लगे. मगर रंगमंच का शौक जो तब इनके जीवन में शामिल हुआ वह कभी नहीं उतरा. इन्होंने रविदास रंगालय के नाम से एक समूह बनाया और लगातार नाटक करते रहे.

यह पूछे जाने पर कि नाटक में तो काफी पैसा खर्च होता है, यह पैसा वे कहां से लाते हैं. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि उनके पास भव्य मंचीय प्रस्तुति के लिए कम ही पैसा होता है. इसलिए उनका जोर नुक्कड़ नाटक पर रहता है. मगर कई दफा कोई प्रायोजक मिल जाता है, या सरकारी आयोजन में बुला लिया जाता है तो वे मंचीय प्रस्तुति भी दे देते हैं. वैसे उनके नुक्कड़ नाटकों को देखने के लिए भी खूब भीड़ उमड़ती है. वे बताते हैं कि बाद में वे उसी भीड़ से पैसा मांगते हैं, ताकि उनके नाटक जिंदा रहें. लोग पैसे भी देते हैं.

रविदास रंगालय के नाटकों के विषय अमूमन भ्रष्टाचार विरोध, सामाजिक भेदभाव और पर्यावरण से संबंधित रहते हैं. इनमें खास कर कपिलदेव राम के अभिनय की लोग खूब सराहना करते हैं. इनके अभिनय की तारीफ करते हुए केबीसी के पूर्व विजेता मोतीहारी निवासी सुशील कुमार कहते हैं कि एक बार वे जमींदार से पीड़ित मजदूर की भूमिका कर रहे थे. जमींदार मंच पर बैठा था, वे अचानक कहीं से मैले-कुचैले कपड़ों में मंच पर आ गये और जमींदार का पांव पकड़ कर रोने लगे कि लोगों को लगा कि नाटक में बाधा उत्पन्न करने के लिए कोई सिरफिरा मंच पर आ गया है. मगर बाद में समझ आया कि यह तो नाटक का हिस्सा है.

सुशील कहते हैं कि कपिलदेव राम की सबसे बड़ी खूबी है कि उन्होंने अपनी जमीन को, अपने पेशे को नहीं छोड़ा, उसे छोटा नहीं समझा, न ही उनके रंगमंच के साथी उन्हें उनके पेशे से जोड़ कर देखते हैं. भोजपुरी फिल्मों में भी उन्हें खूब काम मिलता है, वे चाहें तो उधर शिफ्ट हो सकते हैं. मगर वे काम के बाद हमेशा इसी पंचर की दुकान पर दिखते हैं.

वैसे तो रंगमंच करने वालों के लिए सरकार की तरफ से ग्रांट की भी व्यवस्था रहती है. मगर कपिलदेव राम उस दिशा में जाने से परहेज करते हैं. वे कहते हैं, सरकारी ग्रांट लेने की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार एक जरूरी हिस्सा है, वह अगर पैसे देकर या खुशामद करके सरकारी ग्रांट ले लेंगे तो भ्रष्टाचार के खिलाफ नाटक कैसे करेंगे.

भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता का ही यह उदाहरण है कि 1997 में जब बिहार सरकार लगातार भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी थी तो उन्होंने और उनके साथियों ने सरकारी मंच पर भ्रष्टाचार के विरोध में झांकी निकालने का फैसला किया. उस वक्त गणतंत्र दिवस पर पूर्वी चंपारण के जिला प्रशासन की तरफ से झांकियां निकाली जाती थीं. उस आयोजन में शहर के रंगकर्मी भी भाग लेते थे. तो उस साल रंगकर्मियों ने तय किया कि वे इस झांकी में सरकार के भ्रष्टाचार का विरोध करेंगे. जिला प्रशासन की जानकारी के बगैर रंगकर्मी भ्रष्टाचार के विरोध में झांकी लेकर शहर के गांधी मैदान में उतर गये. खुद कपिलदेव राम ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से मिलते-जुलते किरदार की भूमिका निभायी थी. यह देख कर स्थानीय राजनेताओं ने उनकी शिकायत कर दी और वे राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हो गये.

उनकी गिरफ्तारी के बाद पूरे शहर में रंगकर्मियों और बुद्धिजीवियों द्वारा विरोध प्रदर्शन होने लगे. एक रंगकर्मी जो पेशे से वकील थे, उन्होंने उनकी पैरवी की. संयोगवश शहर के एक बड़े फोटो जर्नलिस्ट ने उस आयोजन की तसवीर उतारी थी, जिसमें उनके गले में लटकी तख्ती में आका लिखा हुआ था. उस घटना को याद करते हुए फोटो जर्नलिस्ट अशोक कुमार वर्मा कहते हैं, कि विरोधी पक्ष ने उनपर यह आरोप लगाया था कि उनके गले में टंगी तख्ती पर लालू यादव लिखा है, यह सरकार की अवमानना है. मगर उनकी ली हुई तसवीर में साफ-साफ आका लिखा था. इसी आधार पर कपिलदेव राम बरी हो गये. मगर सच यही था कि उस झांकी में वे लालू जी की ही भूमिका में थे और उनकी बेहतरीन नकल कर रहे थे.

कपिलदेव राम इतने सहज व्यक्ति हैं कि उस घटना को भुनाकर भी कोई लाभ नहीं लेना चाहते. वे सरकार या किसी संस्था से कोई सहयोग नहीं चाहते. वे अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट हैं. कहते हैं, पेट भरने के लिए पंचर बनाने से पैसे मिल जाते हैं, मन को भरने के लिए नाटक कर लेता हूं. और क्या चाहिए.

(इनपुट- सत्यम कुमार झा)

Written by Bihar Coverez

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