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सरकार ने जारी किया ऐसा फरमान मजदूर हलकान,अधिकारी महकमा हुआ परेशान

बिहार, 
बिहार का मतलब सिर्फ लिट्टी चोखा नही होता, बिहार का मतलब सिर्फ छठ पूजा भी नही होता, नए मायने में बिहार का मतलब पलायन, बदहाल कृषि, भयंकर बेरोजगारी के साथ-2 बाढ़ में विस्थापित लाखो जनता भी है.

बिहार सरकार ने बिहार वापस आये मजदूरों के नाम एक चिठ्ठी जारी किया है जिसमे इन्हें राज्य के लॉ एंड आर्डर के लिए खतरा बताया गया है और सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि इससे निपटने के लिए पहले ही तैयारी कर ली जाए.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस प्रेम पत्र को जारी करने से पहले इन बातों पर एक नजर दौरा लेते तो शायद इनको ये चिठी जारी करने की नौबत नही आती.

एक समय में बिहार में 28 से ज्यादा चीनी मीलें थी आज इस दौर में सिर्फ ग्यारह मीलें है जो  खस्ताहाल अवस्था में चल रही है।

अशोक पेपर मिल जो1963 में  शुरू किया गया था और  1983 में बंद हो गया
2012  में इसको पुनः खोलने की बात हुई थी परन्तु सरकारी दावे औऱ वादों कभी पूरे ही कहाँ होते है?

ऐसे ही अगर बात करें तो मोतिपुर का शुगर मिल जो 1985 में स्थापित हुआ था और 1997-98 में बंद हो गया।

एक दौर में पटना से सटे बिहार शरीफ में हैंडलूम का कारखाना था जो 1961-62 के बीच बना और 1995 के आते तक वह बंद गया
तब उसमें हैंडलूम कामगारों की संख्या 225 था
मेजर प्रोडक्ट कॉटन बेडशीट सिल्क फैब्रिक था
बंद होने का कारण – कच्चा माल मिलना बंद हो गया जो संभवतः जुट पटसन आदि होता था क्योंकि इसका मुख्य कारण बिहार के कृषि का पतन था

भागलपुर में स्थित है Bhagalpur Co-operative Spinning Mill की फैक्ट्री जो लगभग 15000 व्यक्तियोँ को रोजगार देता था
सन 2000 तक आते-आते यह बंद भी हो गया इसके मुख्य प्रोडक्ट थे सिल्क साड़ी फर्निशिंग और ड्रेस मटेरियल

बंद होने का कारण कच्चे मालों का सप्लाई नहीं होना संभवत कच्चे मालों का सप्लाई कृषि से जुड़ा हुआ है और विगत 15 सालों में कृषि के क्षेत्र में बिहार एक पिछड़ा राज्य बन गया है
तभी तो भारत के  किसानों की औसत आय  जहां ₹ 6426, और सबसे ज्यादा पंजाब की हैं जो ₹18059 है और बिहार के किसान वहां मजदूर बनकर पलायन को मजबूर है
औऱ इस मामले में बिहार के किसानों का औसत आय है जो मात्र 3558 रुपए है –(आंकड़ा NSSO 2015 -16)

बताते चले की 2011-12 तक बिहार में बेरोजगारों का आंकड़ा 3.5% था जो 2017-18 तक आते आते  7.8% तक ह्यो गया।
–(स्रोत- NSSO 2019)

खैर अब तो सरकार ही पकौड़ा तलने को बोल रही

दरभंगा में 1958 में स्थापित , डाइंग एंड फिनिशिंग प्लांट था जो 1963 में सुचारू रूप से चलना शुरू हुआ और 1995 के आते-आते तक या पूरी तरीके से बंद हो गया फिर 2002-03 में खोलने का प्लान किया गया लेकिन आज भी वह अपने बदहाल स्थिति में है ,

देश के पुराने मिलो में से एक Warsaliganj  शुगर मिल जो 1933-34 में शुरू हुआ था  1970 में सरकार द्वारा अधिग्रहित किया गया और अंततः 1993-94 में ये बंद हो गया इस पर मजदूरों का बकाया है 5.1 करोड़ , sugarcane ग्रोवर्स (किसानों) का बकाया है 60 लाख इसका बंद होने का कारण यह पता चलता है कि इस को सरकारी मदद नहीं मिल पाया।

Source
Industrybhi.nic.in

WanMakhnai शुगर यूनिट जो 1970-71 में शुरू किया गया था , 1970 में बिहार सरकार ने इसका अधिग्रहण किया, इसका अनसिक्योर्ड लोन है 9.04 करोड़ ,किसानों के बकाया के रूप में है 50 लाख , मजदूरों का बकाया है 24.6 करोड़, मतलब साफ है कि इस पर सरकार ने कभी ध्यान नहीं दिया और इसको सरकारी खजाने से एक पैसा नहीं मिला जिसके कारण 1997-98 आते-आते तक बंद कर दिया गया।

source:google

ऐसे ही दर्जनों कहानियां है दर्जनों किस्से हैं और दर्जनों बंद पड़ी फैक्ट्रियां हैं जिनके कारण बिहार के लोग पलायन करने पर मजबूर हैं वह फैक्ट्रियां कई बार सरकारी मदद की आशा देखती है, और सरकार है कि उधर देखना ही पसंद नहीं करती सरकार चाहे 1990 से 2000 वाली हो सरकार चाहे 2000 से 2019 वाली हो हर सरकार ने , हर व्यवस्था ने बिहार के मजदूरों के साथ, बिहार के किसानों के साथ जो व्यवहार किया, वो यहां के लोगों को व्यथित करता है और अंततः यहां के लोग दो वक्त की रोटी कमाने के लिए अलग-अलग राज्यों में पलायन करने पर मजबूर हैं।
वहां पर उन्हें अलग अलग तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है उनके सम्मान को ठेस पहुँचाया जाता है लेकिन फिर भी वो रोटी की तलाश में भटकते हैं।

Department of Urban Development and Housing 2020 के स्रोत के अनुसार
 
49.46 लाख  सहरसा, 224.175 लाख मुंगेर , 289 लाख पूर्णिया ,  62.17 लाख बोधगया  जिलों के लिए Atal Mission for Rejuvenation of Urban Development के नाम पर दिए गए। सरकारी कार्यालयों में यह फ़ाइल औऱ रुपया कही दबा हुआ है और उसके 2000 के नोट का चिप भी काम करना बंद कर दिया जिसका नतीजा यह है कि इन सभी जिलों को आवंटित राशि में से अब तक कुछ भी खर्च नही हो पाया।
अगर ऐसे ही बंद पर सभी योजनाओं को अमल में लाया जाए तो बिहार के प्रवासी को मजबूरी में पलायान करने से रोका जा सकता है लेकिन स्थिति उल्टी है कि बिहार  सरकार उनको काम नही दे सकती और वो पलायन पर मजबूर है जब कोरोना महामारी ने उनका रोजगार छीन लिया वे कोरोना से मरने के पहले भूख से मरते और मरे भी और वे अपने राज्य लौटने पर विवश हो गए।
यहां आने पर एक तो सरकार ने तो उन्हें कोरोना से बचने के लिए सुविधा तक मुहैया नही करवाया

उनके यही काम मिले इसकी चिंता करने के बजाय उन्हें सरकारी महकमों के द्वारा धमकी दी जा रही है और  सरकार आदेश जारी कर रही है कि देश के अलग-अलग राज्यों से जो बिहार के अपने निवासी हैं जो रोजगार छिन जाने के बाद बिहार वापस आ गए हैं इनके आने के कारण यहां का लॉ- आर्डर की व्यवस्था है उसको बहुत दिक्कत पहुंचने वाली है जीवकोपार्जन की उसकी तलाश में हिंसक हो जाएंगे और सभी  डीएम को चिट्ठी भेजा जा रहा है कि वह हर तरह की तैयारी करके रखें किसी एक दिन उन्हें यह लॉ एंड ऑर्डर के को ठीक करने के लिए लाठी का सहारा न लेना पड़।

माननीय चच्चा अगर आप चिठ्ठी जारी करने से पहले ऐसे बंद पड़े सैकड़ो फैक्टरियों को पुनः खोल का प्रयास नही कर सकते तो कम से कम मजदूरों को, बिहार के निवासियों को उनके अपने समाज के लिए खतरा बनाना बंद कीजिये क्योंकि
जब आप किसी से रोजगार छीने हो, जब आपकी असफल सरकार किसी को पलायन करने को मजबूर कर दिया है, जब वे वापस आएंगे और उन्हें यहां नौकरी नहीं मिलेगी तो तुम्हारा लॉन वे अपनी हक़ की आवाज़ को बुलंद करेंगे। एक डरी हुई सरकार उनको समाज के लिए घातक साबित करने के सिवा कर भी क्या सकती!
वे मजदूर हैं जो खून पसीना बहाना भी जानते हैं, खून पसीना एक करके कमाना भी जानते हैं खून पसीना एक करके इस सरकार बदलना भी जानते है।

By : Vikash Yadav

Joint Secretary A.I.S.A, Bihar

Written by Bihar Coverez

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