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पूर्णिया में सौरा के उत्थान का हो-हल्ला: नदी की राजनीति या राजनीति में नदी


अलग-अलग नदियां समय-समय पर चर्चा में जगह बनाती रहती हैं. अलग-अलग नदियों को मौसम के हिसाब से चर्चा में लाया जाता रहता है. लगभग हर नदियां चुनाव के मौसम में चर्चा में रहती हैं. पुल बनने से लेकर टूटने तक, सुखाड़ से लेकर बाढ़ तक, श्मशान घाट से लेकर रिवर फ्रंट तक, सीढ़ियों से लेकर कारखानों तक, जीवन से मृत्यु तक नदियों की उपस्थिति सुनना निश्चित है. 
पूर्णिया के वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश चंद्रा कहते हैं कि, ‘नदियों को जीवन की धारा कहा गया है. जाहिर सी बात है कि इसका पर्यावरण से सीधा सम्बन्ध है. इस लिहाज से इसकी पारिस्थितिक अहमियत स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है. सौरा को लेकर ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि यह पूर्णिया शहर से गुजरने वाली एकमात्र शेष बची नदी है.’ नदी शेष ही बची है. दबी-दबाई, सिकुड़कर पुल के नीचे से बहती. नगर-निगम द्वारा शहर का कचरा फेंकने का माकूल स्थान. 
जुलाई 2019 में पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र से जद(यू) सांसद संतोष कुशवाहा ने सौरा नदी के संरक्षण, संवर्धन तथा सौंदर्यीकरण संबंधी मांग को लोकसभा सत्र के शून्यकाल में जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का ध्यान आकर्षित करते हुए उठाया था. उनके द्वारा लोकसभा में सौरा नदी को रिवर फ्रंट योजना में शामिल करने का आग्रह भी किया गया था. तब से अबतक कुछ नहीं बदला है, सिवाय सौरा के तट पर शहर का कचरा के बढ़ने तथा सौरा नदी के और प्रदूषित, विषैले तथा उथले होते जाने के.

सौरा नदी मे कचरे का ढेर


कभी एक बड़े क्षेत्र से होकर बहने वाली सौरा नदी को पूर्णिया का टेम्स कहा जाता था. यह भी शहर के बीचोबीच से होकर बहती है. आज इसके जलक्षेत्र में बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें खड़ी हैं. शहर के मेडिकल बाजार तथा घने बस रहे मुहल्लों के बड़े हिस्से में कभी नदी की तेज धार बहा करती थी. आज इस पूरे हिस्से में भू-माफियाओं और मेडिकल-माफियाओं का कारोबार करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमा रहा है. 
लगातार सिकुड़ती गई सौरा नदी के तट पर शहर के मेडिकल कचरे के फेंके जाने से नदी का पानी जहरीला होता जा रहा है. साथ ही इससे शहर का भू-जल भी दूषित और विषैला होता जा रहा है. नदी के तट पर बने श्मशान के रख रखाव की उचित व्यवस्था नहीं होने तथा पूर्णिया नगर निगम द्वारा शहर के कचरों तथा मृत पशुओं के नदी तट पर फेंके जाने से नदी अत्यंत प्रदूषित तथा उथली होती गई है. स्थानीय लोगों का कहना है कि, ‘भू-माफियाओं के इशारे पर प्रशासन के मिलीभगत से ही नगर निगम द्वारा तटबंध के आसपास के क्षेत्रों में कचरा गिराया जाता है ताकि जमीन ऊंची हो सके और उसपर मिट्टी डालकर बिल्डिंग बनाई जा सके. तट पर कई लाख की लागत से बना विद्युत शवदाहगृह उद्घाटन के बाद से ही औंधे मुंह पड़ा है. तट पर पेड़-पौधे गिनती में ही बचे रह गए हैं. सौरा का तटबंध कचरे का ढेर और कंक्रीट के बढ़ते जंगल में पतली लकीर होती गई है. 


सौरा नदी का पूर्णिया की इकोलॉजी में अहम योगदान रहा है. अखिलेश चंद्रा बताते हैं कि, ‘यह नदी कभी खेतों की सिंचाई का जरिया थी. नदी के तटबंध पर जगह-जगह साइफन के निशान दिख जाते हैं जिसका इस्तेमाल पटवन के लिए किया जाता था. सभी साइफन या तो बंद हो गये हैं या फिर बंद कर दिए गये हैं. सौरा के तट पर कभी शीशम आदि के पेड़ों की श्रृंखला हुआ करती थी. बहुत पीछे न जाते हुए 1973-74 के दृश्य से भी तुलना कर लें तो हरियाली पर काफी असर पड़ा है. कहा जा सकता है कि पूर्णिया अब मिनी दार्जिलिग नही रह गया है. पूर्णिया में पहले आज जितनी गर्मी नही पड़ती थी.’
पिछले कुछ वर्षों से सौरा नदी के उत्थान को लेकर पूर्णिया शहर में कई अभियान चलाए गए हैं. शहर में राजनीतिक दलों, सिविल सोसाइटी, अलग-अलग ग्रुप तथा संगठनों तथा शहर से निकलने वाले समाचारपत्रों के नेतृत्व में नदी के संरक्षण, संवर्धन तथा सौंदर्यीकरण को लेकर अभियान अब भी चलाए जा रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी सौरा नदी को बचाने के लिए अभियान लगातार चलाया जा रहा है. 
सौरा नदी के संरक्षण, संवर्धन तथा सौंदर्यीकरण को लेकर ऐसे ही अभियानों में सक्रिय भारतीय जनता पार्टी सदस्य सुमित प्रकाश कहते हैं कि, ‘सौरा नदी को वर्तमान हालात में ही बचा लेना एक महत्वपूर्ण टास्क है. इसके लिए शहर के नागरिकों में जागरूकता लाने के भी कई प्रयास समय-समय पर किए जाते रहे हैं. सौरा नदी के मुद्दे को नेशनल रिवर कन्वेंशन, कोलकाता, आईआईटी BHU की 100वीं स्थापना वर्ष पर काशी में आयोजित पर्यावरण और वेद विज्ञान कॉन्क्लेव, पर्यावरण कुंभ वाराणसी, जलशक्ति मंत्रालय द्वारा आयोजित ‘वाटर सिक्योर, वाटर सरप्लस’ के फोरम पर अब तक सौरा बचाओ अभियान के सदस्यों के द्वारा रखा जा चुका है. 
सौरा नदी के संबंध में पूर्णिया के भाजपा विधायक विजय खेमका द्वारा बिहार विधानसभा में भी आवाज उठाया गया है. विभिन्न संगठनों द्वारा शहर में मोटरसाइकिल जुलूस निकाला गया है. पूर्णिया के जिलाधिकारी स्तर से भी आश्वासन तथा प्रयास करने की बात कही जाती रही है. सौरा नदी के तट को संवारने की योजना पहली बार अस्सी के दशक के अंत में बनी थी. 1987 के प्रलयंकारी बाढ़ के समय शहर के तत्कालीन डीएम राम सेवक शर्मा ने एक मास्टर प्लान बनाकर सरकार को प्रस्ताव भेजा था. उस समय नगर विकास विभाग द्वारा करवाई नहीं हुई तथा डीएम का तबादला हो गया. तबसे अबतक डीएम के तबादले होते रहे और शहर नदी से सटता चला गया. आज शहर ने नदी में इतना अतिक्रमण कर लिया है कि नदी-नाले का भेद खत्म होने को है. 1998 में कटाव से बचने के लिए नदी को सीधा करने का प्रयास भी किया गया था. 
सौरा की धारा में शहर की इमारतें खड़ी हैं. शहरवासी सशंकित हैं कि नदी की धाराओं के बीच इमारत खड़ी करने की अनुमति प्रशासन कैसे दे रही है? इतने अतिक्रमण के बावजूद प्रशासन चुप कैसे है? आज पूर्णिया में सौरा नदी के पानी के सभी लिंक चैनल बंद हो गए हैं.  सौरा नदी का पानी निकलने के लिए लाइन बाजार चौक से कप्तान पुल के बीच चार पुल बनाए गए थे.नदी की धाराओं पर बने पुलों को चमकदार तो बना दिया गया है मगर पुल के नीचे बहने वाली धारा गायब है. शहर से पानी निकासी का कोई श्रोत नहीं है. आलम यह है कि अगर सौरा नदी में बाढ़ के समय में सैलाब आ जाए तो पूर्णिया शहर दोनों तरफ से पूरी तरफ तबाह हो जाएगा.
अखिलेश चंद्रा 1987 की बाढ़ को याद कर कर बताते हैं कि, ‘सौरा का तटबंध टूटने के कारण शहर में पानी आ गया था. डीएम कोठी में भी पानी था. शहर में कई पुल पुलिया बह गये थे और कई जगह शहर की सड़कें क्षतिग्रस्त हो गई थी. नदी का पानी बढ़ने से अभी भी शहर के कई मोहल्ले जलमग्न हो जाते हैं. अब अधिक तबाही इसलिए भी होगी कि पानी की निकासी का कोई मार्ग नहीं बचा है. 2017 में जलस्तर बढ़ने से कई सौ घरों में पानी घुस गया था तथा शहर के लोग इसकी संभावना से सशंकित थे. समय-समय पर नदी का जलस्तर बढ़ने से आसपास के क्षेत्रों में पानी घुसता रहता है.


भू-माफियाओं द्वारा तटबंध के आसपास की जमीन का लगातार अतिक्रमण जारी है. तटबंध के आसपास ऊंची-ऊंची बिल्डिंगें बनना जारी है. पटना नगर निगम द्वारा तटबंध पर युद्ध स्तर पर कचरा डंप करना जारी है. प्रशासन द्वारा आंख बंद कर नदी उद्धार के वादे समय-समय पर किया जाता रहता है. शहर में मोटरसाइकिल से लेकर नदी में नाव जुलूस तक निकाला जाता रहता है. डीएम से लेकर जल संसाधन मंत्री के द्वारा अलग-अलग विभाग के अधिकारियों की टीम बनाकर जांच के आदेश दिए जाते रहते हैं.  पटना से लेकर दिल्ली तक आवाज गूंजती रहती है. ‘सौरा बचाओ’ के नारे के बीच नए इमारत की नींव डाली जाती रहती है. नदी की आजादी की आवाजें नदी की दुर्गति पर पर्दा डालते रहती है. शहर का लगातार प्रदूषित हो रहा भू-जल और पर्यावरण शहरवासियों के लिए खतरे की घंटी ठनठनाते रहता है. सौरा नदी के बहाने शहर की राजनीति समय-समय पर हुंकार मारते रहती है.

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