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बिहार में सड़क परिवहन

हाल में उत्तर प्रदेश में बसों को लेकर काफ़ी हंगामा हुआ. योगी आदित्यनाथ और प्रियंका गाँधी के बीच बहस के केंद्र में 1000 बसें थीं. किसी भी बिहारी को ये आंकड़ा सुनकर शर्म आई होगी अगर उसे ज़रा सा भी अंदाज़ा होगा कि बिहार राज्य में कितनी सरकारी बसें हैं.
सरकारी आंकड़ों https://bit.ly/2Tvv0dI के मुताबिक 2015 में राज्य सरकार के पास 223 बसें थीं- चंडीगढ़ और अंडमान-निकोबार से भी कम. 2014 में ये आंकड़ा 424 था. मतलब एक साल में बसों की संख्या घटी ही है. अख़बारों के अनुसार इस वक़्त सरकार के पास 600 के करीब बसें हैं. 2018 के राज्य बजट में पूरे ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट को महज 50 करोड़ दिए गए थे- सैलरी, मेंटेनेंस आदि के लिए. तो नई बसों की ख़रीद कितनी हुई होगी सोचा जा सकता है.ऐसे में उत्तर प्रदेश में एक अवसर पर 1000 बसों की बहस हो तो बिहारियों के लिए शर्म की बात होनी वाज़िब है. 

बसों के बाद सड़कों की बात 
1. बिहार में अगर गोपालगंज से किशनगंज तक के स्वर्णिम चतुर्भुज वाले एनएच 27 और गया से सासाराम वाले एनएच 19 को छोड़ दें तो तो कोई अन्य ढंग का हाईवे नहीं हैं. यहाँ तक कि पटना-गया और पटना-मुज़फ्फ़रपुर को जोड़ने वाली सड़क भी झारखण्ड मे रांची-हजारीबाग और रांची -जमशेदपुर सड़क के सामने ख़राब लगती है.

2. अमूमन हर बड़े शहरों- दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु ने आसपास के अपेक्षाकृत छोटे शहरों को जोड़ने के लिए एक्सप्रेसवे बनाया हुआ है- मुंबई-वड़ोदरा, दिल्ली-आगरा, चेन्नई-बेंगलुरु एक्सप्रेसवे हैं. केवल कोलकाता से न तो पटना, न भागलपुर, न गया के लिए कोई डेडिकेटेड एक्सप्रेसवे है, न ही बनाने का प्लान है. एक्सप्रेस वे बनने से आर्थिक उन्नति आती है, ये हमने दिल्ली-जयपुर और मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के उदाहरण से देखा है. 

3. राज्य सरकार का दावा है कि राज्य के किसी भी कोने से पटना 5 घंटे में पहुंचा जा सकता है पर धरातल पर यही दिखता है कि पटना से बेतिया, पटना से पूर्णिया और यहाँ तक कि पटना से मधुबनी की कई बसें रात में छूटती हैं.  अगर वाकई में ये दूरियां 5-6 घंटे की होतीं तो दिन में ही चलती बसें. बिहार के किसी भी जिले को बायपास करने वाली शायद ही कोई सड़क है. आपको उस जिले से गुज़रना है तो प्रबल सम्भावना है कि आपको उस जिले के बाज़ार या जिला मुख्यालय से होकर गुज़रना पड़ेगा. और इस वजह से एक-दो घंटे अतिरिक्त जोड़ना जरुरी हो जाता है. मगर नीतीश कुमार को लगता है कि जैसे उनकी गाड़ी के गुजरने से पहले बाज़ार बंद करवा दिया जाता है या सड़कों पर आवाजाही रोक दी जाती है, वैसे ही बाक़ी बिहारियों के साथ भी होता होगा. तभी हर बात में 5 घंटे में पटना पहुँचने की रट लगाये रहते हैं. 

4. बिहार में सड़क न बन पाने की एक बड़ी वजह जमीन अधिग्रहण को बताया जाता है. शायद इसी वजह से 5 साल बाद भी मुंगेर से बेगुसराय को जोड़ने वाले गंगा पुल पर सड़क चालू नहीं हुआ है. लेकिन वहीँ उत्तर प्रदेश में राज्य सरकारें अपने बलबूते पर एक्सप्रेसवे बनवा दे रही हैं- लखनऊ से आगरा, लखनऊ से झाँसी, लखनऊ से बलिया. यहाँ दक्षिण और पश्चिम भारत की बात भी नहीं की जा रही है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य तक में अधिग्रहण हो जा रहा है मगर बिहार में ही नहीं हो पा रहा. कहीं ऐसा तो नहीं कि राज्य सरकार के सड़क डिपार्टमेंट और इसके अधिकारियों के लिए नाच न आवे तो आंगन टेढा है? 

5. पटना-गया एनएच और पटना-मुजफ्फरपुर एनएच अभी तक पूरा नहीं हुआ है. पटना और मुजफ्फरपुर राज्य के दो बड़े शहर हैं और इनके बीच एक ही पुल है और वो भी आधा टूटा हुआ. दो बड़े शहरों के बीच आवाजाही की सुविधा नहीं तो आर्थिक तरक्की का सपना महज सपना ही रह जाने वाला है. बिहार शायद अकेला ऐसा राज्य है जहाँ केंद्र सरकार के काम भी बहुत धीमे होते हैं. यहाँ अभी तक NHDP फेज़ 3 पर ही काम चल रहा है, जबकि बाकी देश में NHDP फेज़ 5 https://bit.ly/2XiNCim और 6 https://bit.ly/36m549H पर काम शुरू हो गया है.

आलेख – माधव श्रीमोहन

Written by Bihar Coverez

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