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भोपाल से बिहार की यात्रा श्रमिक स्पेशल ट्रेन से.

Bhopal

वैसे तो भारत में कोरोना का पहला मामला फरवरी में ही आ गया था, लेकिन मार्च आते-आते जब इसने अपने पैर पसारना शुरू किया तो इसके चैन को तोड़ने के लिए तालाबंदी का सहारा लेना पड़ा. तालाबंदी से पहले देश में प्रधानमंत्री ने एक दिन का जनता कर्फ्य़ू का ऐलान किया। जिसके बाद 25 मार्च से पूरे देश में 21 दिन की  तालाबंदी की घोषणा की गई। तालाबंदी के बाद लोग देश के जिस हिस्से में थे वहीं फंस गए। मैं भी भोपाल में था। तालाबंदी के बाद लोग परेशान हो गए। लेकिन दिन निकलने के साथ-साथ मैं भी खूद को इस परिस्थिति में रहने की आदत ये सोचकर डाल लिया कि 21 दिन बाद सब सही हो जाएगा। इधर जैसे-जैसे दिन निकल रहा था उसके साथ ही कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। 

मेरे साथ मेरे विश्वविद्यालय का एक और साथी था। उससे फोन पर घर जाने को लेकर रोज बातें होती थी कि कैसे निकला जाए। इधर तालाबंदी को हुए एक महीने से ज्यादा हो गया। देश में मजदूरों का पलायन शुरू हो गया। जिसके बाद मजदूरों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेने चलनी शुरू हुई। सभी राज्य सरकार ने रजिस्ट्रेशन वगैरह करना चालू किया। जिसके बाद मैं ये इंतजार करने लगा कि सरकार रजिस्ट्रेशन किया है तो जरूर ले जाएगी। और एक दिन भोपाल से भी बिहार के लिए ट्रेनें खुलेंगी। और फिर एक दिन भोपाल से ट्रेन खुलने की समाचार मिली।

यात्रा की शुरूआत यहां से हुई.

सोमवार 18 मई की रात को वाट्सअप पर एक मैसेज आया जिसमें लिखा था कि हबीबगंज से अररिया (बिहार) के लिए अगले दिन 19 मई को दिन में एक गाड़ी खुलेगी। मैसेज पढ़ने के बाद मैने अपने साथी को फोन किया और उसे इस ट्रेन की सूचना दी। जिसपर उसने कहा कि हो सकता है कि ये न्यूज़ फेक हो। तो अपने सूत्र से इसके बारे में पता किया तो ये जानकारी सही मिली।

अगले दिन मंगलवार 19 मई की सुबह हां ना करते हुए अंत में हम दोनों ने यहां से निकलने का फैसला किया और बिहार जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए हम दोनों हबीबगंज स्टेशन पहुंचे। स्टेशन परिसर में लोग लगातार आते जा रहे थे और ट्रेन पकड़ने के लिए प्रशासन द्वारा लगाए गए लाइन का हिस्सा बनते जा रहे थे। सभी लोग सोशल डिस्टेंसिंग का ख्य़ाल रखते हुए लाइन में लगे थे। मैं भी लाइन में लगकर आगे बढ़ा। स्टेशन परिसर में आगे एक काउंटर लगा था जहां ट्रेन में बैठने से पहले यात्रियों की स्क्रिनिंग की जा रहा था। उसके आगे बढ़ने पर यात्रियों को गंतव्य स्थान का टिकट और खाने का पैकेट (जिसमें चार पूरी, सब्जी और दो पैकेट बिस्किट और पानी का एक बोतल था) दिया जा रहा था। वहां से आगे बढ़ने पर प्लेटफॉर्म शुरू हो गया जहां ट्रेन पहले से आकर खड़ी थी। प्रशासन द्वारा सभी सीटों पर यात्रियों को बैठाया जा रहा था। ट्रेन शायद 4 या 5 बजे के करीब खुली। गाड़ी भोपाल, होते हुए बीना जंक्शन पर जाकर रुकी। वहां अनाउंस हुआ की कोई भी यात्री नीचे न उतरे। सभी यात्रियों को उनके सीट पर खाना और पानी दिया जाएगा। कुछ देर बाद पानी और ब्रेड का पैकेट बोगी के गेट पर फेंक दिया गया। लोग आपस में छिना-झपटी करने लगे। किसी के हाथ दो बोतल पानी आया तो कोई देखते ही रह गया. मैने सोचा कि यहां सोशल डिस्टेंसिंग देखूं या पेट की भूख। ख़ैर ट्रेन आगे बढ़ी। सागर, दामोह होते हुए कटनी आकर रूकी। वहां अनाउंस किया जा रहा था कि कटनी सतना वाले उतर जाएं क्योंकि सतना में गाड़ी नहीं रुकेगी। वहां से बढ़ने के बाद गाड़ी इलाहाबाद छिवकी पहुंची। लोगों को स्टेशनों पर छोड़ते हुए ट्रेन 11से 12 के बीच दानापुर पहुंची। जहां मैं उतर गया। ट्रेन वहां से कुछ देर बाद आगे निकल गई।

दानापुर का हाल

जहां पर लगी भीड़ ये बता रही थी कि यहां कितना सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा रहा है। स्टेशन परिसर में लोग उतर कर बाहर जा रहे थे। यहां से आगे कैसे जाना है किसी को कुछ मालूम नहीं मेरे साथी भी अपने जिला तक जाने के लिए उपाय खोजने लगा। और मै अपने ज़िला के लिए। बाहर निकलने पर टेंट दिखाई दिया वहां से अलग-अलग जिलों के लिए बस और ट्रेन की घोषणा किया जा रहा थी। स्टेशन परिसर में सोशल डिस्टेंसिंग का कहीं कोई अता पता नहीं चल रहा था। वैसे तो भोपाल से निकलते समय एक बार मन में आया था कि कहीं घर जाते-जाते संक्रमित तो नहीं हो जाएंगे। वो बात यहां आकर मन में फिर से दोहराया क्योंकि बाहर से आने वाली ट्रेनों में  दानापुर आने के साथ हीं सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ जाती है। ट्रेन से उतरने वालों के लिए प्लेटफार्म संख्या एक पर कुछ टेबल लगाए गए थे जिस पर आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग किया जा रहा था 

मैं भी प्लेटफार्म संख्या एक लगे एक टेबल पर जाकर अपना स्क्रिनिंग करवाया। वहां से बाहर निकला जहां विभिन्न जिलों में जाने के लिए घोषणा की जा रही थी।

कभी ट्रेन तो कभी बस के बारे में सूचनाएं दी जा रही थी कि फलाने जिला के लिए बस जा रही है फिर कुछ समय बाद यह बोला जाता था कि बस नहीं वहां के लिए ट्रेन निकल रही है। प्लेटफार्म पर कुछ पता नहीं चल पा रहा था कि क्या करें। गाड़ी अगर ट्रेन जाएगी तो कौन सी ट्रेन जाएगी और कहां तक जाएगी। वहां से बाहर निकल कर देखा तो कुछ प्राइवेट वाहन जैसे ऑटो, कारें लगी हुई थी जो लोगों को विभिन्न जगहों तक छोड़ने के लिए काफी ज्यादा किराए की मांग कर रहे थे दानापुर से हमारे जिले की दूरी तकरीबन 90 से 100 किलोमीटर के आसपास है जिसके लिए मुझे ऑटो वालों ने 2500 रुपया की मांग की वहीं कार वालों ने इसके के लिए 4000 रुपए मैंने मना कर दिया और फिर वापस स्टेशन आ गया और ट्रेन का इंतजार करने लगा कुछ समय बाद एक ट्रेन आई। लेकिन यह ट्रेन कहां जाएगी कुछ पता नहीं चल पा रहा था मैने ट्रेन के ड्राइवर से पुछा तो पता चला कि यह ट्रेन बरौनी जाएगी। जिसके मैं भी सवार हो गया कि कम से कम बरौनी तक तो पहुंच जाएंगे। ट्रेन करीब 3:00 बजे के आसपास वहां से निकली ट्रेन में भी इतना ज्यादा था कि सोशल डिस्टेंसिंग की क्या बात किया जाए बिहार आते-आते ट्रेन में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ जाती है एक सीट पर 5 से 6 लोग बैठे थे। मैं एक सीट पर बैठा था मुझे एक लड़के ने आकर हाथ से हटने के लिए बोला बताया कि इस पर और लोग बैठेंगे मैंने कहा कि कोरोनावायरस चल रहा है और अभी सोशल डिस्टेंसिंग का लोगों को ध्यान रखना चाहिए। आप भी अपना ध्यान रखिए तो उन्होंने कहा कि हम लोग सूरत से आ रहे हैं और सूरत से हम लोग ऐसी आए हैं 3 लोग 4 लोग एक सीट पर बैठ के फिर मैं वहां से ऊपर वाले सीट पर चला गया क्योंकि ऊपर वाली सीट पर कोई नहीं था और नीचे पूरा भर गया कुछ देर बाद मैं वहां से दूसरे डब्बे में जाना उचित समझा क्योंकि वहां भीड़ इतनी ज्यादा थी कि संक्रमण का खतरा था।

ट्रेन सीधे दानापुर से खुलने के बाद पटना जंक्शन आकर रुकी वहां खाने के लिए बोगी के गेट पर केक और पानी का बोतल फेंका गया।खाना और पानी फेंकने के साथ ही लोगों ने खाने के ऊपर जैसे झपटना शुरू कर दिया। जिसको जो हाथ लगा वही रख लिया। लोग एक दूसरे से खाना छीनने लगे। भीड़ में लोग सोशल डिस्टेंसिंग और संक्रमित होने का खतरा भूलकर खाने के लिए एक दूसरे के ऊपर झपट रहे थे। करीब 5 घंटे बाद गाड़ी मेरे गंतव्य स्थान पर पहुंची। मैं वहां उतर गया और बाहर निकला तो वहां पर बसे लगी हुई थी। जिसमें सभी लोगों को स्टेशन से रजिस्ट्रेशन केंद्र तक छोड़ा गया।

स्टेशन पर लगी बस का हाल

बस में भी सोशल डिस्टेंसिंग का कोई पालन नहीं किया जा रहा था। बस की सभी सीटें जब तक फूल नहीं होता था तब तक बस को खोला नहीं जाता था। ऐसे में हम इस बीमारी से कैसे बच सकते हैं। खैर बस में सवार होकर रजिस्ट्रेशन सेंटर पहुंचा जहां पर स्टूडेंट होने के कारण मुझे  होम कोरेंटिन के लिए मुझे बोला गया। फिर वहां से मैं अपने घर आ गया। फिलहाल ख़ूद को 14दिन के लिए एक अलग कमरे में बंद हूं। आज पांच दिन हो गया है अब आगे के नौ दिन में जो भी होगा आपसे साझा करूंगा‌।

अंत में एक बात और कहूंगा। कुछ चीजों पर हमें स्वयं भी ध्यान देना होगा। इतना समझदार तो होना ही होगा। सबकुछ सरकार द्वारा ही होगा अगर हम ये सोचकर चलेंगे तो सब चौपट हो जाएगा। सबकी अपनी-अपनी जिम्मेवारी होती है। हमें उस चीज को समझना होगा।

विकाश कुमार झा 

एमएससी (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ) 

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल

Written by Bihar Coverez

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